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ईश्वर के दलाल

ईश्वर के दलाल
मोबाइल में अपने बेटों के चित्र दिखाते हुए महिला

उत्तराखंड-(बड़ी खबर): स्कूली बच्चों से भरी बस हुई हादसे का शिकार, छात्रा व शिक्षिका की मौत.. मची चीख पुकार

इंडिया भारत न्यूज डेस्क: उत्तराखंड के उधमसिंह नगर जिले के सितारगंज में बाल दिवस के दिन एक बड़ा सड़क हादसा हो गया। किच्चा स्थित एक स्कूल की छात्राओं से भरी एक बस सितारगंज में नयागांव भट्टे के पास हादसे का शिकार हो गई। हादसा इतना भयंकर था कि एक छात्रा व शिक्षिका की मौत हो गई। जबकि दो दर्जन से अधिक बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए। जिसमें कई छात्राओं को हायर सेंटर रेफर कर दिया है। घटनास्थल पर कुछ घंटे तक अफरा तफरी का माहौल रहा। मौके पर चीख पुकार मच गई। सूचना के बाद पहुंची पुलिस व स्थानीय लोगों ने घायलों को किसी तरह बस से बाहर निकाल अस्पताल पहुंचाया।

दरअसल, वैद्य राम सुधी सिंह गर्ल्स स्कूल किच्छा की छात्राओं को रविवार को स्कूल की ओर से चिल्ड्रेंस डे पर स्कूल बस से नानकमत्ता टूर पर लाया गया था। बस में स्टाफ के साथ करीब 50 ईश्वर के दलाल से अधिक छात्राएं थीं। शाम को वापासी के दौरान सितारगंज में नयागांव भट्टी के पास स्कूल बस की ट्रक से टक्कर हो गई। टक्कर इतनी जबर्दस्त थी कि बस सड़क पर पलट गई। स्कूल बस हादसे को देखकर लोगों में आफरा तफरी मच गई। बच्चों में चीख पुकार मच गई। लोगों ने बस से लहूलुहान बच्चों को निकालना शुरू किया।

छात्रा और शिक्षिका की मौत

अस्पताल ले जाने तक छात्रा ज्योत्सना निवासी वार्ड नंबर 2 आजाद नगर सुभाष कॉलोनी किच्छा और शिक्षिका लता गंगवार की मौत हो गई। बस से निकाल कर घायल बच्चों को लोगों ने अपने वाहनों से अस्पताल पहुंचाया। कुछ देर में चौकी थाने से पुलिस कर्मी और एंबुलेंस भी मौके पर पहुंच गई। दो दर्जन से अधिक छात्राओं को गंभीर चोटें आई है।

सीएचसी सितारगंज की अधीक्षक डॉ. अभिलाषा पांडे ने बताया कि हादसे में दो लोगों की मौत हुई है। बस में 51 स्कूली बच्चें व स्टाफ सवार थे। 22 लोगों को हायर सेंटर रेफर किया गया है। जबकि दो दर्जन से अधिक बच्चों को प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई है। 6 बच्चों का अस्पताल में उपचार चल रहा है। वही, उधम सिंह नगर के जिलाधिकारी युगल किशोर पंत ने बताया कि सड़क हादसे में बच्चों को चोटें आई हैं। बच्चों का अस्पताल में उपचार चल रहा हैं।

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सीएम ने दिए मजिस्ट्रियल जांच के आदेश

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हादसे में दो लोगों की मौत पर शोक व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने घायलों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ और मृतकों के शोक संतप्त स्वजन को धैर्य प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की है। सीएम ने मृतक के परिवार को 2-2 लाख रुपये की सहायता राशि प्रदान करने के साथ ही सभी घायलों का सरकार की ओर से निश्शुल्क उपचार सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने दुर्घटना की मजिस्ट्रयल जांच के आदेश दिए है।

दलाल वसंत निरवाना

दलाल वसंत निरवाना के गैलरी कवर की तस्वीर

अस्वीकरण: हालांकि Housing.com इस अनुभाग में दी गई जानकारी की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए सभी कदम उठाता है, कृपया डेवलपर्स के साथ भी इसकी जांच करें। Housing.com प्रदान की गई जानकारी में किसी भी विसंगतियों की जिम्मेदारी नहीं लेता है।

भोपाल गैस त्रासदी की तरह गुजरात में भी मतदान सम्पन्न होने तक मोरबी पुल हादसे को भुला दिया जाएगा !

भोपाल गैस त्रासदी की तरह गुजरात में भी मतदान सम्पन्न होने तक मोरबी पुल हादसे को भुला दिया जाएगा !

Gujrat Election 2022 : भोपाल गैस त्रासदी के लिए अगर यूनियन कार्बाइड प्रबंधन के साथ-साथ अर्जुनसिंह सरकार भी ज़िम्मेदार थी तो मोरबी हादसे के लिए गिनाए जा रहे कारण 'भगवान की मर्ज़ी' के अलावा गुजरात सरकार और घड़ी बनाने वाली ओरेवा कंपनी के प्रबंधकों के बीच साँठगाँठ की ओर भी इशारा करते हैं.

वरिष्ठ संपादक श्रवण गर्ग सवाल कर रहे हैं क्या मोरबी में भी भोपाल होगा?

मोरबी से कौन जीतने वाला है? क्या भाजपा ही जीतेगी या मतदाता उसे इस बार हराने वाले हैं? प्रधानमंत्री अगर साहस दिखा देते कि दर्दनाक पुल हादसे की नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए भाजपा मोरबी से अपना कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा करेगी तो मतदान के पहले ही मोदी गुजरात की जनता की सहानुभूति अपने पक्ष में कर सकते थे। उन्होंने ऐसा नहीं किया। प्रधानमंत्री मोदी भावनाओं में बहकर राजनीतिक फ़ैसले नहीं लेते। वर्तमान के क्रूर राजनीतिक माहौल में इस तरह के नैतिक साहस की उम्मीद किसी भी राजनीतिक दल से नहीं की जा सकती।

स्थापित करने के लिए कि केबल पुल की देखरेख और उसका संचालन करने वाली कंपनी के प्रबंधकों के साथ पार्टी के बड़े नेताओं की कोई साँठगाँठ नहीं थी, मोरबी सीट जीतने के लिए भाजपा अपने सारे संसाधन दाव पर लगा देगी। कंपनी का एक मैनेजर पहले ही दावा कर चुका है कि हादसा 'ईश्वर की मर्ज़ी' से हुआ है। पार्टी की जीत का श्रेय प्रधानमंत्री के नेतृत्व को दिया जाने वाला है, ईश्वर की मर्ज़ी को नहीं।

भाजपा ने मोरबी से छह बार के विधायक और पिछले (2017 के) चुनावों के पहले कांग्रेस से भाजपा में भर्ती हुए बृजेश मेरजा की जगह कांतिलाल अमृतिया को टिकिट दिया है। मोरबी का 140 साल पुराना पुल अमृतिया के सामने ही ध्वस्त हुआ था। दुर्घटना के समय के वायरल हुए एक वीडियो में एक शख़्स को ट्यूब पहनकर मच्छू नदी से लोगों की जानें बचाते हुए देखा गया था। बाद में बताया गया कि वह शख़्स अमृतिया ही थे। भाजपा ने अब अमृतिया के कंधों पर मोरबी सीट को बचाने की ज़िम्मेदारी डाल दी है। अमृतिया का वीडियो अगर वायरल नहीं हुआ होता तो मोरबी से चुनाव लड़ने के लिए भाजपा को उम्मीदवार ढूँढ़ना मुश्किल हो जाता।

( चित्र में गुलशन राठौड़ मोबाइल अपने बेटों के चित्र दिखाते हुए)

लोगों की जानें बचाने वाले को तो भाजपा ने टिकट देकर पुरस्कृत कर दिया, पर सरकार द्वारा उन लोगों को दंडित किया जाना अभी बाक़ी है जिनके कारण सैकड़ों मौतें हुईं और अनेक घायल हुए। मोरबी के भयानक हादसे में 55 बच्चों सहित 143 लोगों की जानें गई हैं और सैकड़ों अभी भी ईश्वर के दलाल घायल बताए जाते हैं। (न्यूज़ पोर्टल 'द प्रिंट' ने गुलशन राठौड़ नामक एक महिला की मार्मिक कथा जारी की थी, जिसमें बताया गया था कि इस ग़रीब माँ ने घटना के तुरंत बाद किस तरह बदहवास हालत में घर की रोज़ी-रोटी चलाने वाले अठारह और बीस साल की उम्र के अपने दो बेटों की हरेक जगह तलाश की थी।)

'मैं जब कई घंटों तक उन्हें कहीं और नहीं ढूँढ़ पाई तो मोरबी सिविल अस्पताल के मुर्दाघर पहुँची जहां पाया कि दोनों बेटे लावारिस लाशों की क़तार के बीच बेसुध पड़े हुए हैं और उनकी साँसें अभी चल रहीं हैं। मैंने तुरंत दोनों को पास के एक निजी अस्पताल में इलाज के लिए पहुँचाया। दोनों की रीढ़ की हड्डियों में चोट पहुँची है। मुझे पता नहीं अब हम क्या तो खाएँगे और कैसे मकान का भाड़ा चुकाएँगे।' गुलशन ने खबर में बताया था।

साल 1984 में दिसंबर 2 और 3 की दरम्यानी रात भोपाल में दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना यूनियन कार्बाइड के संयंत्र से ज़हरीली गैस (MIC) लीक हो जाने की हुई थी। इस दुर्घटना के ईश्वर के दलाल कोई एक महीना पहले ही (31 अक्टूबर) प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नई दिल्ली में हत्या हो गई थी और लोकसभा चुनावों की घोषणा कर दी गई थी। दिसंबर अंत में देश के साथ भोपाल लोकसभा सीट के लिए भी मतदान होना था। भोपाल का चुनाव स्थगित नहीं किया गया।

अर्जुनसिंह तब अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। डॉ शंकर दयाल शर्मा निवृतमान लोक सभा में भोपाल से कांग्रेस के सांसद थे। कांग्रेस ने डॉ शर्मा के स्थान पर के एन प्रधान को भोपाल से अपना उम्मीदवार बनाया था। त्रासदी के बीच ही चुनाव प्रचार भी सम्पन्न हो गया , मतदान भी हो गया और कांग्रेस ने भोपाल सहित प्रदेश की सभी चालीस सीटें भी जीत लीं। डॉ शर्मा गैस कांड के तीन साल बाद पहले उपराष्ट्रपति और फिर राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए।

गैस कांड में जान देने वालों का सरकारी आँकड़ा 2,259 का और ग़ैर-सरकारी आठ हज़ार से ऊपर का है। अपुष्ट आँकड़े बाईस से पच्चीस हज़ार मौतों के हैं। कोई पाँच लाख से अधिक लोग घायल और हज़ारों स्थायी रूप से अपंग हो गये थे। मानवीय चूक के कारण हुई इस त्रासदी में मारे गए हज़ारों लोगों की मौत पर इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति भारी पड़ गई थी और कांग्रेस को देशभर में ऐतिहासिक जीत हासिल हुई थी।

भोपाल गैस त्रासदी के लिए अगर यूनियन कार्बाइड प्रबंधन के साथ-साथ अर्जुनसिंह सरकार भी ज़िम्मेदार थी तो मोरबी हादसे के लिए गिनाए जा रहे कारण 'भगवान की मर्ज़ी' के अलावा गुजरात सरकार और घड़ी बनाने वाली ओरेवा कंपनी के प्रबंधकों के बीच साँठगाँठ की ओर भी इशारा करते हैं। मोरबी ज़िले में विधानसभा की तीन सीटें हैं। इनमें मोरबी और वांकानेर के अलावा टंकारा की वह सीट भी है, जहां आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म हुआ था।

मोरबी की दुर्घटना के बाद भोपाल गैस त्रासदी का हवाला देते हुए चेताया गया था कि लोगों की याददाश्त कमज़ोर होती है, वे सब कुछ भूल जाएंगे! मोरबी में पुल टूटने की घटना और गुजरात में मतदान के बीच भी समय 1984 दिसंबर जितना ही रहने वाला है। तो क्या गुजरात में मतदान सम्पन्न होने तक भोपाल की तरह ही मोरबी का भी सब कुछ भुला दिया जाएगा? गुलशन राठौड़ और उनके जैसी सैकड़ों कहानियों समेत!

भोपाल गैस त्रासदी अगले महीने की दो और तीन तारीख़ को अपने आतंक के अड़तीस साल पूरे कर लेगी। त्रासदी के चार महीने बाद मार्च 1985 में जब अर्जुनसिंह के नेतृत्व में मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनाव हुए थे तो राज्य में फिर से कांग्रेस की हुकूमत क़ायम हो गई थी। मंत्री बदल गए थे, पर दलाल वैसे ही क़ायम रहे। त्रासदी के लिए दोषी किसी भी बड़े आरोपी को सज़ा नहीं मिली। उसके कुछ गुनहगारों की आज भी तलाश की जा सकती है।

हो सकता है मोरबी की कंपनी में बनने वाली घड़ियों की सुइयाँ साल बदलती रहें और भोपाल की तरह ही पुल दुर्घटना के असली गुनहगारों को भी क़ानून ढूँढता रह जाए! राजनीति तो संवेदनहीन हो ही चुकी है, क्या मानवीय संवेदनाओं से मतदाताओं के सरोकार भी ख़त्म हो गए हैं? अगर यही सत्य है तो फिर लोकतंत्र को भूलकर उस व्यवस्था के लिए तैयार रहना चाहिए जिसकी कि ओर मोरबी के पुल की देखरेख और संचालन करने वाली कंपनी के प्रमुख ने अपनी गुजराती पुस्तक 'समस्या अने समाधान' में इशारा किया है' चीन की तरह ही देश में चुनाव बंद कर योग्य व्यक्ति को 15-20 साल का नेतृत्व दीजिए जो हिटलर की तरह डंडा चलाये।

क्या मोरबी में भी भोपाल होगा ?ईश्वर के दलाल

भोपाल गैस त्रासदी के लिए अगर यूनियन कार्बाइड प्रबंधन के साथ-साथ अर्जुनसिंह सरकार भी ज़िम्मेदार थी तो मोरबी हादसे के लिए गिनाए जा रहे कारण ‘भगवान की मर्ज़ी’ के अलावा गुजरात सरकार और घड़ी बनाने वाली ओरेवा कंपनी के प्रबंधकों के बीच साँठगाँठ की ओर भी इशारा करते हैं।

Morbi Bridge Collapse In the picture woman mobile showing pictures of his sons

मोबाइल में अपने बेटों के चित्र दिखाते हुए महिला

मोरबी से कौन जीतने वाला है ? क्या भाजपा ही जीतेगी या मतदाता उसे इस बार हराने वाले हैं ? प्रधानमंत्री अगर साहस दिखा देते कि दर्दनाक पुल हादसे की नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए भाजपा मोरबी से अपना कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा करेगी तो मतदान के पहले ही मोदी गुजरात की जनता की सहानुभूति अपने पक्ष में कर सकते थे। उन्होंने ऐसा नहीं किया। प्रधानमंत्री भावनाओं में बहकर राजनीतिक फ़ैसले नहीं लेते। वर्तमान के क्रूर राजनीतिक माहौल में इस तरह के नैतिक साहस की उम्मीद किसी भी राजनीतिक दल से नहीं की जा सकती।

स्थापित करने के लिए कि केबल पुल की देखरेख और उसका संचालन करने वाली कंपनी के प्रबंधकों के साथ पार्टी के बड़े नेताओं की कोई साँठगाँठ नहीं थी ,मोरबी सीट जीतने के लिए भाजपा अपने सारे संसाधन दाव पर लगा देगी। कंपनी का एक मैनेजर पहले ही दावा कर चुका है कि हादसा ‘ईश्वर की मर्ज़ी’ से हुआ है। पार्टी की जीत का श्रेय प्रधानमंत्री ईश्वर के दलाल के नेतृत्व को दिया जाने वाला है, ईश्वर की मर्ज़ी को नहीं।

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भाजपा ने मोरबी से छह बार के विधायक और पिछले (2017 के) चुनावों के पहले कांग्रेस से भाजपा में भर्ती हुए बृजेश मेरजा की जगह कांतिलाल अमृतिया को टिकिट दिया है। मोरबी का 140 साल पुराना पुल अमृतिया के सामने ही ध्वस्त हुआ था। दुर्घटना के समय के वायरल हुए एक वीडियो में एक शख़्स को ट्यूब पहनकर मच्छू नदी से लोगों की जानें बचाते हुए देखा गया था।

बाद में बताया गया कि वह शख़्स अमृतिया ही थे। भाजपा ने अब अमृतिया के कंधों पर मोरबी सीट को बचाने की ज़िम्मेदारी डाल दी है। अमृतिया का वीडियो अगर वायरल नहीं हुआ होता तो मोरबी से चुनाव लड़ने के लिए भाजपा को उम्मीदवार ढूँढना मुश्किल हो जाता।

लोगों की जानें बचाने वाले को तो भाजपा ने टिकट देकर पुरस्कृत कर दिया पर सरकार द्वारा उन लोगों को दंडित किया जाना अभी बाक़ी है जिनके कारण सैंकड़ों मौतें हुईं और अनेक घायल हुए।

मोरबी के भयानक हादसे में 55 बच्चों सहित 143 लोगों की जानें गईं हैं और सैंकड़ों अभी भी घायल बताए जाते हैं। ( न्यूज़ पोर्टल ‘द प्रिंट’ ने गुलशन राठौड़ नामक एक महिला की मार्मिक कथा जारी की थी जिसमें बताया गया था कि इस ग़रीब माँ ने घटना के तुरंत बाद किस तरह बदहवास हालत में घर की रोज़ी-रोटी चलाने वाले अठारह और बीस साल की उम्र के अपने दो बेटों की हरेक जगह तलाश की थी।

‘मैं जब कई घंटों तक उन्हें कहीं और नहीं ढूँढ पाई तो मोरबी सिविल अस्पताल के मुर्दाघर पहुँची जहां पाया कि दोनों बेटे लावारिस लाशों की क़तार के बीच बेसुध पड़े हुए हैं और उनकी साँसें अभी चल रहीं हैं। मैंने तुरंत दोनों को पास के एक निजी अस्पताल में इलाज के लिए पहुँचाया।

दोनों की रीढ़ की हड्डियों में चोट पहुँची है। मुझे पता नहीं अब हम क्या तो खाएँगे और कैसे मकान का भाड़ा चुकाएँगे ’’, गुलशन ने खबर में बताया था।

साल 1984 में दिसंबर 2 और 3 की दरम्यानी रात भोपाल में दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना यूनियन कार्बाइड के संयंत्र से ज़हरीली गैस (MIC) लीक हो जाने की हुई थी।

इस दुर्घटना के कोई एक महीना पहले ही (31 अक्टूबर) प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नई दिल्ली में हत्या हो गई थी और लोक सभा चुनावों की घोषणा कर दी गई थी। दिसंबर अंत में देश के साथ भोपाल लोक सभा सीट के लिए भी मतदान होना था।

भोपाल का चुनाव स्थगित नहीं किया गया । अर्जुन सिंह तब अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। डॉ शंकर दयाल शर्मा निवृतमान लोक सभा में भोपाल से कांग्रेस के सांसद थे।

कांग्रेस ने डॉ शर्मा के स्थान पर के एन प्रधान को भोपाल से अपना उम्मीदवार बनाया था। त्रासदी के बीच ही चुनाव प्रचार भी सम्पन्न हो गया , मतदान भी हो गया और कांग्रेस ने भोपाल सहित प्रदेश की सभी चालीस सीटें भी जीत लीं। डॉ शर्मा गैस कांड के तीन साल बाद पहले उपराष्ट्रपति और फिर राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए।

गैस कांड में जान देने वालों का सरकारी आँकड़ा 2,259 का और ग़ैर-सरकारी आठ हज़ार से ऊपर का है। अपुष्ट आँकड़े बाईस से पच्चीस हज़ार मौतों के हैं।

कोई पाँच लाख से अधिक लोग घायल ईश्वर के दलाल और हज़ारों स्थायी रूप से अपंग हो गये थे। मानवीय चूक के कारण हुई इस त्रासदी में मारे गए हज़ारों लोगों की मौत पर इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति भारी पड़ गई थी और कांग्रेस को देशभर में ऐतिहासिक जीत हासिल हुई थी।

भोपाल गैस त्रासदी के लिए अगर यूनियन कार्बाइड प्रबंधन के साथ-साथ अर्जुनसिंह सरकार भी ज़िम्मेदार थी तो मोरबी हादसे के लिए गिनाए जा रहे कारण ‘भगवान की ईश्वर के दलाल मर्ज़ी’ के अलावा गुजरात सरकार और घड़ी बनाने वाली ओरेवा कंपनी के प्रबंधकों के बीच साँठगाँठ की ओर भी इशारा करते हैं।

मोरबी ज़िले में विधानसभा की तीन सीटें हैं। इनमें मोरबी और वांकानेर के अलावा टंकारा की वह सीट भी है जहां आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म हुआ था।

मोरबी की दुर्घटना के बाद भोपाल गैस त्रासदी का हवाला देते हुए चेताया गया था कि लोगों की याददश्त कमज़ोर होती है, वे सब कुछ भूल जाएंगे !

मोरबी में पुल टूटने की घटना और गुजरात में मतदान के बीच भी समय 1984 दिसंबर जितना ही रहने वाला है। तो क्या गुजरात में मतदान सम्पन्न होने तक भोपाल की तरह ही मोरबी का भी सब कुछ भुला दिया जाएगा ? गुलशन राठौड़ और उनके जैसी सैंकड़ों कहानियों समेत !

भोपाल गैस त्रासदी अगले महीने की दो और तीन तारीख़ को अपने आतंक के अड़तीस साल पूरे कर लेगी। त्रासदी के चार महीने बाद मार्च 1985 में जब अर्जुनसिंह के नेतृत्व में मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनाव हुए थे तो राज्य में फिर से कांग्रेस की हुकूमत क़ायम हो गई थी।

मंत्री बादल गए थे पर दलाल वैसे ही क़ायम रहे। त्रासदी के लिए दोषी किसी भी बड़े आरोपी को सज़ा नहीं मिली । उसके कुछ गुनहगारों की आज भी तलाश की जा सकती है। हो सकता है मोरबी की कंपनी में बनने वाली घड़ियों की सुइयाँ साल बदलती रहें और भोपाल की तरह ही पुल दुर्घटना के असली गुनहगारों को भी क़ानून ढूँढता रह जाए !

राजनीति तो संवेदनहीन हो ही चुकी है, क्या मानवीय संवेदनाओं से मतदाताओं के सरोकार भी ख़त्म हो गए हैं ? अगर यही सत्य है तो फिर लोकतंत्र को भूलकर उस व्यवस्था के लिए तैयार रहना चाहिए जिसकी कि ओर मोरबी के पुल की देखरेख और संचालन करने वाली कंपनी के प्रमुख ने अपनी गुजराती पुस्तक ‘समस्या अने समाधान’ में इशारा किया है :’ चीन की तरह ही देश में चुनाव बंद कर योग्य व्यक्ति को 15-20 साल का नेतृत्व दीजिए जो हिटलर की तरह डंडा चलाये।’

गालियों का लोकतंत्र!

देश के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री सरदार पटेल और मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती। दोनों नेता लगभग एक ही संवैधानिक कद के माने जाते हैं। दोनों नेताओं के कालखंड भिन्न हैं। दोनों नेताओं की चुनौतियां और समस्याएं अलग-अलग रही हैं। सरदार पटेल ने देश का एकजुट, अखंड और संप्रभु स्वरूप तैयार किया था। प्रधानमंत्री मोदी देश को 21वीं सदी की एक वैश्विक ताकत बनाने में जुटे हैं। दोनों ही नेता गुजरात से आते हैं। बल्कि सरदार पटेल तो प्रधानमंत्री मोदी के, कई मायनों में, आदर्श रहे हैं। अब गुजरात में विधानसभा चुनाव का मौसम है, तो कांग्रेस को अपने ही विलुप्त नेता सरदार पटेल की याद आई है। प्रधानमंत्री मोदी ने सरदार पटेल की, विश्व में सबसे ऊंची, प्रतिमा तैयार करा उसे स्थापित कराया था और उसे ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ नाम भी दिया था। सरदार पटेल की जयंती 31 अक्तूबर अब ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के तौर पर मनाई जाती है। सरदार पटेल की आड़ लेकर कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी को एक बार फिर गाली दी है-औकात दिखा देंगे।

गुजरात में कांग्रेस का घोषणा-पत्र जारी करते हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस सत्ता में आई, तो नरेंद्र मोदी स्टेडियम का ईश्वर के दलाल नाम पलट कर ‘सरदार पटेल’ कर दिया जाएगा, क्योंकि बुनियादी नाम वही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मधुसूदन मिस्त्री ने ‘औकात’ की जो बात कही है, कमोबेश वह पहले की अभद्र और असभ्य गालियों की तुलना में शालीन है। मोदी के देश के प्रधानमंत्री बनने से पहले और बाद में कांग्रेस ने जो गालियां दी हैं, उससे पार्टीवालों की नफरत स्पष्ट होती है। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ‘मौत का ईश्वर के दलाल सौदागर’ और ‘ज़हर की खेती’ के अलावा वरिष्ठ सांसद राहुल गांधी की ‘चौकीदार चोर है’ और ‘खून की दलाली’ सरीखी गालियों समेत कांग्रेस के मंत्री, नेताओं ने प्रधानमंत्री के लिए ‘चायवाला’, ‘नीच आदमी’, ‘बिच्छू’, ‘सांप’, ‘गंदी नाली का कीड़ा’, ‘हत्यारा’, ‘यमराज’, ‘अनपढ़’,‘गंवार’, ‘हिटलर’ और ‘भस्मासुर’ आदि अपशब्दों का बार-बार इस्तेमाल किया है। यह कैसा लोकतंत्र है, जिसमें गालियां देना ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ है? राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि देश की राष्ट्रपति एवं संवैधानिक प्रमुख द्रौपदी मुर्मू के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। बंगाल की ममता सरकार के मंत्री अखिल गिरि ने राष्ट्रपति के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और फिर माफी का बयान दे दिया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खामोश रहीं और कोई कार्रवाई नहीं की।

यह स्वीकार्य नहीं है। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने ‘सडक़छाप आदमी’ की तरह राष्ट्रपति मुर्मू के लिए ‘राष्ट्रपत्नी’ शब्द का इस्तेमाल किया। वह आज भी अपने पद पर आसीन हैं। कांग्रेस के ही एक अन्य नेता उदित राज ने राष्ट्रपति मुर्मू के संदर्भ में ‘चमचागीरी’ शब्द का इस्तेमाल किया। कांग्रेस ने किसी भी नेता के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। सिर्फ निजी बयान करार दे दिया। यह प्रवृत्ति विपक्ष में ही नहीं है। सत्तारूढ़ भाजपा के एक प्रवक्ता ने दिल्ली के निर्वाचित मुख्यमंत्री केजरीवाल को ‘ढोंगी, निकम्मा, डरपोक’ कहा है। यह भी घोर आपत्तिजनक और गैर-लोकतांत्रिक है। कमोबेश भाषा की मर्यादा और शब्दों के संस्कार बरकरार रखे जाने चाहिए। गालियों से किस पक्ष को मजबूत जनादेश और लबालब वोट हासिल हुए हैं? इतिहास गवाह है कि जब भी मोदी को गालियां दी गई हैं, तो उन्होंने उसे ‘गुजरात की अस्मिता’ का मुद्दा बना लिया है। प्रधानमंत्री ने तेलंगाना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए गालियों की राजनीति पर तंज किया और कहा कि उन्हें 20-22 सालों से हररोज़ अढाई-तीन किलो गालियां मिलती हैं। ईश्वर ने उन्हें कुछ ऐसा दिया है कि गालियां पोषाहार बन जाती हैं और उन्हें ऊर्जा मिलती रहती है। नतीजतन वह थकते नहीं हैं। बेशक भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन अपशब्दों और नफरत की राजनीति हमारे दावों और सम्मानों को कलंकित करती है। गालियों की राजनीति देश को स्वीकार्य नहीं है।

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